Monday, August 25, 2014

मोदी जी की वो हुंकार, लगाने लगी है अब बेकार|

मोदी जी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद कहा था कि हमें आँख झुका कर नहीं बल्कि आँख मिला कर बात करनी चाहिए| यदि कोई आँख दिखाने की कोशिश करे तो उसको माकूल जवाब देना चाहिए|
पाकिस्तान एक ही माह में अनेकों प्रकार से सीजफायर का उलंघन कर चुका है| और आये दिन करता ही जा रहा है| बोर्डर के आस पास की भोली भाली जनता अपनी जान बचाने के लिए घर से बेघर होकर दर दर भटक रही है|
आज पाकिस्तान कदम कदम पर भारत को आँख दिखा रहा है और हमारी सरकार न जाने क्यों आँख मुंद कर बैठी हुई है| हो सकता है इसमे कोई कूटनीति या राजनीति हो| परन्तु देश की भोली भाली जनता न कूटनीति जानती है और न ही राजनीति| भोली  भाली जनता  तो बस सामने वाले ने जो कहा है उसी पर विश्वास करती है|
लोक सभा के चुनावों से पहले भी मोदी जी कुछ इसी प्रकार की बातें किया करते थे| चुनाव से पहले और बाद में भी अच्छे दिन आने वाली बात कई  बार कही गयी| पाकिस्तान की ना-पाक हर्क्क्तों के कारण अब बोर्डर के आसपास रहने वाली जनता के अच्छे दिनों के बजाय बुरे दिन आ गए हैं| माना कि देश में मानसून की कमी के कारण महंगाई ने पैर पसारे और ईराक युद्द के कारण तेल महंगा हुआ| परन्तु अब जो पाकिस्तान आँखे दिखा रहा है तो उसको माकूल जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है|
अन्त में मैं भारत सरकार से अनुरोध करना चाहता हूँ कि देश की जिस भोली भाली जनता ने भाजपा पर पूर्ण विश्वास करके मोदी जी की बहुमत की सरकार बनाने का कार्य किया है उस भोली भाली जनता का वह विश्वास  बना रहे| और मोदी जी की वह  हुंकार, होने न पाए बेकार||
 

Wednesday, August 6, 2014

संसद एक मंदिर या कुश्ती का अखाड़ा|

ऐसा माना जाता है कि किसी भी देश का संसद एक मंदिर की तरह से होता है| परन्तु आजकल हमारे देश की संसद एक अखाड़े की तरह से हो गयी है| संसद में सभी सांसदों को समाज के उत्थान और देश के विकास के विषय में चर्चा करनी चाहिए| देश के किस प्रदेश की क्या क्या समस्याएं है इस पर चर्चा होनी चाहिए| देश से किस प्रकार से साम्प्रदायिकता को समाप्त करके भाईचारा कायम किया जाए इस पर चर्च होनी चाहिए| देश किस किस प्रकार की जवलंत समस्यायों से जूझ रहा है इस पर चर्चा होनी चाहिए|परन्तु  आजकल संसद में सांसदों का केवल और केवल एक दुसरे के ऊपर छींटाकसी के अलावा कोई काम नहीं है|
 
संसद में नारेबाजी करना,बेकार के संवाद जैसे मोदी जी नेपाल में मंदिर क्यों गए ईद की मुबारकबाद क्यों नहीं दी जबकि ऐसा कुछ नहीं है फिर भी संसद का कीमती समय इस प्रकार की फिजूल की बातों पर बर्बाद किया जाता है|
 
देश के सभी सांसदों को विचार करना चाहिए कि संसद चलने के दिन देश का बहुत अधिक धन व्यय होता है वह धन बेकार की बातों में नष्ट न करके देश के विकास और उत्थान के लिए प्रयोग होना चाहिए|

Friday, August 1, 2014

सच्ची पूजा |

हर धर्म का प्राणी अपने धर्म के अनुसार पुजा अर्चना  करता है| सही मायने में पुजा पाठ करने से मन को शान्ति मिलनी चाहिए| ज्यादातर ऐसा होता है कि पुजा पाठ करते हुए भी मानव का मन इधर उधर डोलता रहता है| मेरे मतानुसार मन पर नियंत्रण करने का ही दूसरा नाम पुजा है|

गृहस्थ जीवन  में जो व्यक्ति  अपने परिवार का सच्चे मन से पालन करता है वह भी भगवान की पुजा कहलाती है| संत रविदास जी का जीवन भी कुछ इसी प्रकार से रहा है| रविदास जी जाति से चमार थे| अपने पारिवारिक व्यवसाय के अनुसार वह भी जूती गांठने का कार्य करते थे| अपने परिवार के पालन कार्य में खर्च करने के बाद जो धन बचता  उसे वह दिन दुखियों की सहायता  और साधू संतों की सेवा में खर्च करते थे|

एक बार उनकी दूकान पर राजपुरोहित जी (पंडित) अपनी जूती ठीक कराने के लिए आये| जूती गांठते  हुए भी रविदास जी धर्म से सम्बंधित बातें करते रहे उनकी बातों से पंडित जी भी काफी प्रभावित हुए जिसके कारण पंडित जी का रविदास जी की दुकान पर आना जाना शुरू हो गया|

 एक दिन पंडित जी ने रविदास जी से कहा कि मैं गंगा स्नान करने जा रहा हूँ तुम भी हमारे साथ चलो| रविदास जी ने कहा कि मेरे पास ग्राहकों का काफी काम करना बाकी है उसे समय पर देना है जिसके कारण मैं आपके साथ गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकता| आप मेरी ओर से एक पैसा गंगा जी को दे देना|

पंडित जी गंगा स्नान के लिए चल दिए| गंगा घाट  पर पहुँच कर पंडित जी ने स्नान करके गंगा मैया की पुजा अर्चना के बाद आरती की| अपने सभी कार्यों से फारिग होने के बाद उन्होंने रविदास जी के द्वारा दिया गया पैसा गंगा जी में उछालने के लिए  जैसे ही हाथ ऊपर को उठाया तो तुरंत आवाज आई कि हे मुर्ख ब्राह्मन किसी के द्वारा दी गयी भेंट को फैंक कर नहीं बल्कि सम्मानजनक रूप से उसके हाथों में देना चाहिए|

ऐसा सुनते ही पंडित जी चित्रलिक्खे से  अचंभित हो चारों ओर देखने लगे तो देखा कि गंगा जी के अन्दर से एक हथेली बाहर आई पंडित जी ने वह पैसा उस हथेली के ऊपर रख दिया इसके बाद गंगा जी में से दूसरी हथेली बाहर आई उसमे एक रत्नजडित, अदितीय और बहुत ही सुन्दर कंगन था तुरंत आवाज आई कि हे ब्राह्मन यह कंगन मेरे भक्त रविदास को देदेना| पंडित जी ने वह कंगन ले लिया|

पंडित जी का मन उस अद्दभुत कंगन को देख ईर्ष्या से जल उठा| और लालच के वशीभूत मन के डावांडोल होने पर विचार करने लगे कि इस कंगन पर रविदास का नहीं बल्कि मेरा अधिकार है मैंने बहुत ही भक्तिभाव से गंगा जी की पूजा की उसी से प्रसन्न होकर गंगा  जी प्रगट हुईं यह पैसा तो अचानक बीच में आ गया जिसके कारण उन्होंने यह कंगन रविदास को देने के लिए कहा मैं यह कंगन अपनी पण्डितायन  को दूंगा इसे देखकर वह खुश हो जायेगी|

फिर मन में विचार आया कि यह कीमती कंगन है|  मैं राजा के यहाँ से प्राप्त दक्षिणा से अपने परिवार का पालन करता हूँ| पडोसी इसे देख चर्चा  करेंगे कि ऐसा कीमती कंगन  इस ब्राह्मन के पास कहाँ से आया? चोर उचक्कों का डर अलग से| अगर मैं इस कंगन को राजा साहब को दूंगा तो वह बहुत खुश होंगे|

ऐसा विचार कर पंडित जी ने उस कंगन को राजा को भेंट स्वरूप दे दिया|  राजा ने उस कंगन को अपनी रानी को दिया रानी ने उस कंगन को देख कर राजा से कहा कि महाराज इस कंगन का जोड़ा मिला दीजिये ताकि मैं अपने दोनों हाथों में एक से ही कंगन पहन सकूँ| दोनों हाथों में एक जैसे कंगन पहनने से हाथों की शोभा बढ़ेगी|

राजा ने अगले दिन पंडित जी से उस जैसा दूसरा कंगन लाने के लिए कहा| ऐसा सुनते ही पंडित जी के पैरों के नीचे से ज़मीं खिसक गयी| परेशान हो सोचने लगे कि यह सब उस रविदास के कारण ही हुआ है क्यों न मैं उसे ही इस जाल में फंसा  दूँ| ऐसा सोच कुटिल चाल चलते हुए राजा से कहा कि महाराज यह कंगन तो रविदास ने दिया था अत: संदेशवाहक को भेज कर उससे दूसरा कंगन मंगा  लीजिये|

राजा ने अपने एक कर्मचारी को वह कंगन देकर रविदास जी के पास भेज दिया| पंडित जी भी उस कर्मचारी के पीछे पीछे चल दिए| कर्मचारी के द्वारा दूसरा कंगन मांगने पर रविदास जी ने गंगा जी की स्तुति की| सभी घटित  घटनाओं का बोध होने पर उन्होंने गंगा मैया से प्रार्थना की और कहा कि हे गंगा मैया आज मेरे कारण यह गरीब ब्राह्मन संकट में फंस  गया है अत: इस जैसा ही दूसरा कंगन देने कीकृपा करे|

ऐसा सोचकर उन्होंने अपने सामने रक्खी कठौती में हाथ डाल दिया | (जिस  मिटटी के बर्तन में पानी भर कर चमार चमड़े को भिगो कर नरम करते हैं उस बर्तन को कठौती कहते हैं) जैसे ही उन्होंने हाथ बर्तन से बाहर निकाला उसमे दूसरा पहले जैसा ही कंगन था|

इस द्रश्य को देख पंडित जी आश्चर्यचकित हो रविदास जी के पैरों में गिर कर माफ़ी मांगने लगा| रविदास जी ने पंडित जी को गले से लगा लिया| ऐसे ही व्यक्तियों के बारे में कहा गया है कि:-
                                                                बड़े बड़ाई न तजें बड़े न बोलें बोल|
                                                              हीरा कब मुख से कहे लाख टका मेरा मोल|| 

 उपरोक्त कहानी के आधार पर हमें विचार करना है कि हमारे द्वारा की गयी पूजा कैसी होनी चाहिए| पूजा कोई  दिखावे के लिए नहीं होती| पूजा मन की शांति  के लिए की जाती है| जिस कार्य को करने से मन को शान्ति मिले वही  पूजा है|

Thursday, July 3, 2014

आस्था और विश्वास|

 शंकराचार्य श्री स्वरूपानन्द जी महाराज आज कल श्री सांई राम जी के संदर्भ में अपनी गलत बयानबाजी के कारण विवादों के घेरे में फंसते जा रहे हैं| जबकि इतने महान व्यक्ति को इस प्रकार की बयानबाजी न करके समाज को जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए|

हमारे देश में अनेक धर्मों को मानने वाले व्यक्ति निवास करते हैं| सभी हिन्दू, मुस्लिम, सिख और इसाई अपने धर्म के अनुसार अपने अपने पीर पैगम्बरों की पूजा अर्चना करते है| हमारा हिन्दू समाज तो अनेकोंनेक देवी देवताओं की अपनी आस्था और विश्वास के साथ पूजा करते हैं|

हमारे देश में हिन्दू समाज ही नहीं बल्कि दूसरे  धर्म वाले भी व्यक्ति पूजा में विश्वास करते हैं| यदि कोई भी व्यक्ति नि:स्वार्थ  भाव से  समाज को सुधारने के साथ साथ  समाज में फैली कुरीतियों को दूर करते करते अपने प्राणों कीआहुति दे देता है तो लोग स्वत: ही उसके आदर्शों को मानते हुए देवता के सामान उसकी पूजा करने लगते है|

श्री शंकराचार्य जी महाराज कहते हैं कि श्री सांई राम जी के अनुसार सबका मालिक एक है सबका मालिक एक| इस पर शंकराचार्य जी का कहना है कि जिसका मालिक कोई और है आखिर उसकी पूजा क्यों की जाए|

उपरोक्त विषय में हमारे देश के सभी धर्मों के धर्माचार्य कहते हैं कि पूजा पाठ करने के रास्ते अनेक हैं परन्तु सबकी मंजिल एक है| अर्थात वह अद्धभुत, अतुलनीय,स्मरणीय और  चमत्कारिक शक्ति एक ही है जो इस समस्त चराचर को संचालित कर रही है वह शक्ति अजन्मा और निराकार है| फिर भी लोग अनेकोंनेक देवी देवताओं की पूजा अपनी आस्था और विश्वास के साथ करते हैं|

हमारे देशवासी बहुत ही आशावादी और एकदूसरे का अनुशरण करने वाले हैं| इसी संदर्भ में संस्क्रत की एक कहानी "गतानुगति लोके:" का वर्णन करता हूँ जो इस प्रकार है|

हमारे देश में हिन्दू समाज में हर गाँव गाँव और शहरों में आसाढ़ माह में शीतला माता का गाँव या शहर से बाहर बने स्थान पर माँ बहनें अपने बच्चों के साथ  खील पतासे, मिट्ठे पूड़े और  कई प्रकार की दालों को एक साथ मिलाकर जल के लौटे से माता को स्नान कराकर पूजन करती हैं|

एक बार ऐसा हुआ कि एक बहन अपने बच्चे के साथ उपरोक्त सामान लेकर गाँव से बाहर माता का पूजन करने के लिए जा रही थी| रास्ते में उसे बहुत जोर से पेशाब जाने की इच्छा हुई तब उसने एक एकांत स्थान देख कर जल के लौटे के साथ पूजन की समस्त सामग्री अपने बच्चे को पकड़ा कर पेशाब करने के लिए चली गयी| वापस आकर उसने बच्चे से कहा कि लौटे के जल से मेरे हाथ धुलादे| बच्चे ने जैसे ही लोटे से पानी हाथों पर डाला तो उसका दूसरा हाथ डौल गया जिससे पूजा का कुछ सामान जैसे पूड़े, दाल व् खील पतासे वहां पर गिर गए|

उस स्थान से गुजरने वाली अन्य बहनों ने देखा कि यहाँ पर भी किसी ने पूजन किया है हो सकता है सबसे पहले इसी स्थान पर पूजन किया जाता हो अत: मुझे भी यहाँ पूजन करना चाहिए| इसी धटना से उस स्थान को भी पूजा जाने लगा|

इस घटना  का सम्बन्ध केवल आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है वैसे भी देहात की एक कहावत है की मानते का ही देव है| अर्थात सच्चे मन से किसी भी देवी देवता की आराधना करने से मानव इस भवसागर से पार हो जाता है| 

Monday, May 19, 2014

"भ्रूणहत्या"

आज हमारा देश "भ्रूणहत्या" नामक अभिशाप से पूर्ण रूप से ग्रसित है| इसको एक सामाजिक बिमारी का नाम दिया जाए तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी|

इस बिमारी को बढ़ावा देने में सबसे बडा हाथ दहेज़ प्रथा का है| जब किसी भी परिवार में कन्या का जन्म होता है तो पूरा परिवार ख़ुशी मनाने के स्थान पर दुखी सा नजर आता है| जबकि लड़के के जन्म होने पर ढोल नगाड़ों से उसका स्वागत किया जाता है|

किसी भी परिवार में जन्मी कन्या जब धीरे धीरे जवान होने लगती है तो उस कन्या के मां बाप की धड़कनें तेज होने लगती हैं| जहां भी लड़की का पिता लड़की के लिए वर खोजने के लिए जाता है तो उसे दहेज़ रूपी राक्षक का सामना करना पड़ता है|

ज्यों त्यों करके जब कन्या की शादी हो जाती है तो वर पक्ष की दहेज़ के प्रति संतुस्ठी न होने के कारण उसकी सजा कन्या के साथ साथ उसके पिता जी को भी भुगतनी पड़ती है| वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि जिस अपनी लाड चाव से पाली लड़की की शादी में उसने अपनी वर्षों से संचित सम्पत्ति का स्वाहा किया था आज वही लड़की दुखी है| तो उसकी आत्मा चीत्कार कर उठती है|

इस प्रकार की घटनाओं को देख कर यह "भ्रूणहत्या" नामक बिमारी समाज में फैलने लगती है| ख़ास तौर पर इस बिमारी से हिन्दू समाज सबसे अधिक ग्रसित है| हिन्दू समाज में भी सबसे अधिक वैश्य समाज के उच्च श्रेणी का परिवार अपने यहाँ पुत्री को जन्म नहीं देना चाहता है| और वह सरकार के द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भी अपने धन के बल पर यह जानने में सफल हो जाता है कि गर्भ में कन्या है जिससे वह भ्रूणहत्या करा देता है|

इस बिमारी के कारण आज भारत में लड़कों के मुकाबले में लड़कियों की संख्या समय समय पर कम होती जा रही है| जिसका खामियाजा भी अधिकतर उच्च श्रेणी के परिवारों को ही भुगतना पड़ता है| जब पुत्र कीआयु ३० के आंकड़े को पार करने लगती है तो वह मध्यम श्रेणी के परिवार की कन्या खोजनी शुरू कर देता है| परन्तु मध्यम श्रेणी का व्यक्ति भी उच्च श्रेणी में श्रेणी के अंतर के कारण अपनी कन्या की शादी नहीं करता है|

आज यह स्थिति है कि उच्च श्रेणी के परिवार अपने लडके की शादी के लिए निम्न श्रेणी के परिवारों की कन्या से बिना दहेज़ के शादी करने के लिए तैयार हो जाते है|

वैसे तो इस बिमारी से हमारा पूरा समाज ही परेशान है| आज की इस असुरक्षा के माहौल में इज्जत के साथ लड़की का पालन पोषण करना  कठिन दिखाई देता है| इस दिशा में भी हमारे देश की सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है|

अन्त में मैं अपने देशवासियों से निवेदन करना चाहता हूँ कि हमें इस गंभीर विषय पर अपने देश, समाज और अपने वंश के लिए गंभीरता से विचार करने होगा| वर्ना एक दिन ऐसा आएगा कि समाज में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जायेगी और हमारे परिवारों के लड़कों की शादी में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा|
                                                                                                                            (प्रमोद कुमार गुप्ता)

"राहुल तो अभी बच्चा है जी"

"राहुल तो अभी बच्चा है जी" राहुल जी वास्तव में राजनीति में अभी बच्चे ही हैं इसमें कोई शक नहीं है परन्तु पार्टी के कुछ चापलूस नेताओं ने राहुल जी के मन में कुछ इस प्रकार के भाव भर दिए थे कि वह खुद को पार्टी का खेवनहार समझ बैठे| उन्होंने दूसरों के पद की गरिमा का अपमान भी करना शुरू कर दिया था|
पार्टी की  हार का ठींकरा अब मनमोहन सिंह जी के मौन के कारण उनके सर पर फोड़ने की तैयारी चल रही है| इस पर विचार किया जाए तो मनमोहन जी को पार्टी के अन्दर बोलने का अधिकार ही कहाँ था| कांग्रेस पार्टी में तो शुरू से ही जो सोनिया जी ने कह दिया वही सही होता था| कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल जी को बनाए जाने के बाद तो राहुल जी अपने आप को पार्टी का मसीहा ही समझ बैठे| 
पार्टी को खुद से अपनी हार के विषय में मंथन करना होगा कि मनमोहन सिंह जी मौन क्यों रहते थे? पार्टी में भ्रष्टाचारी मंत्रियों का बोलबाला किसके कारण था? पार्टी में कौन कौन चापलूस हैं? पार्टी की कौन कौन सी नीतियों के कारण पार्टी विनाश के कगार पर पहुंची है? क्यों देश की जनता ने पार्टी को सिरे से नकार दिया है?
कांग्रेस पार्टी को अपनी नीतियों में बदलाव करके ही चलने पर पार्टी जिन्दा रह सकती है| पार्टी के वरिष्ठ नेतायों को भी अपनी चमचागिरी की निति को छोड़ कर चलना होगा तभी भविष्य में कांग्रेस पार्टी का जनाधार बढ़ सकता है|

Monday, May 5, 2014

नारी व्यथा |

मजबूरियों  का  जाल है  नारी   की  जिन्दगी,
दहेज़ की आग में जलती है औरत की जिन्दगी||

  मां, बाप, भाई, और  पति  की  दर्ष्टि   में,
 एक बब्धन का नाम है नारी की जिन्दगी||

गाँव, शहर  और  नगर  की  हर  गली  गली  में,
कदम कदम पर रौंदी जाती है नारी की जिन्दगी||

दुनिया को  जिसने खुशियाँ  बांटी  उम्रभर,
काँटों से  भरी  सेज  है नारी  की  जिन्दगी ||

चुनरी  की  जगह  इसको  कफ़न तो न दीजिये,
कहे पा का कि खुशियों से भर दो नारी की जिन्दगी||